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अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती खाई

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अमेरिका और यूरोप के बीच पश्चिमी गठबंधन की शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद हुई, जिसका नेतृत्व करते हुए अमेरिका ने सत्तर वर्ष से ज्यादा समय तक उदार विश्व व्यवस्था को स्थिरता और सुरक्षा प्रदान की। हालांकि यह विश्व व्यवस्था हमेशा उदार नहीं रही, और कई बार इसने व्यवस्था के बजाय अव्यवस्था ही पैदा की। बड़े पैमाने पर यूरोपीय शक्तियों से लैस 29 नाटो सदस्य देशों ने साम्यवाद के प्रसार और सोवियत साम्राज्य के प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए यह गठबंधन बनाया, जो अमेरिका के वित्तीय और सैन्य समर्थन के चलते बना रहा। भले यह अस्तित्व के संकट से नहीं जूझ रहा है, लेकिन अमेरिका और यूरोप के बीच रिश्ते चरमरा रहे हैं, क्योंकि इस गठबंधन का मुख्य खिलाड़ी अमेरिका अब मुफ्त में यूरोप को सुरक्षा देने को अनिच्छुक है। जाहिर है, डोनाल्ड ट्रंप नोबेल विजेता मिल्टन फ्रीडमैन के मंत्र का अनुपालन करते हैं-मुफ्त जैसी कोई चीज नहीं होती!

अतीत में अमेरिका और यूरोप के बीच मतभेद रहे हैं, आइजनहावर के नेतृत्व में अमेरिका ने 1956 में स्वेज नहर पर फ्रेंच-ब्रिटिश-इस्राइली हमले का विरोध किया था और जर्मनी व फ्रांस ने 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले का खुलेआम विरोध किया था। प्रमुख यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं मानती हैं कि 2008-09 में पूरी दुनिया को अपने घेरे में लेने वाली आर्थिक मंदी अमेरिका की गलत वित्तीय नीति का परिणाम थी। तो फिर इसमें नया क्या है? नयापन मतभेद को जाहिर करने के तरीके और उसकी तीव्रता में है, राजनयिक तौर-तरीकों का पालन करने से हटने और चौराहे पर गंदे कपड़े साफ करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। हाल ही में कनाडा में संपन्न हुआ जी-7 सम्मेलन इसकी पूरी कहानी बयान करता है। अपने प्रचार अभियान के दौरान ट्रंप ने सोवियत साम्राज्य के पतन के बाद नाटो को ‘जर्जर’ एवं ‘अप्रासंगिक’ बताया था। हैरानी की बात नहीं कि उनका ट्वीट नाटो सहयोगियों के लिए बेहद आलोचनात्मक है। उन्होंने नाटो सहयोगियों को ‘मुफ्तखोर’ बताया, जो रक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का दो फीसदी खर्च करने की अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान नहीं करते हैं। इसी तरह से उन्होंने यूरोपीय संघ की आलोचना की, जो अमेरिका के साथ व्यापार में 137 अरब अमेरिकी डॉलर के अधिशेष का फायदा उठाता है, लेकिन अमेरिकी कृषि निर्यात के खिलाफ बाधाएं बढ़ाता है।

जर्मनी ने यूरोप के बाकी हिस्सों की तरह पर्यावरणीय आधार पर अपने कोयला और परमाणु ऊर्जा संयंत्र बंद कर दिए हैं, लेकिन इसकी अनदेखी करते हुए ट्रंप ने उसे रूस का गुलाम बताते हुए हमला किया कि ‘हम जर्मनी की रक्षा करते हैं, हम फ्रांस की रक्षा करते हैं, हम यूरोपीय संघ के सभी देशों की रक्षा करते हैं और फिर इनमें से कई देश बाहर जाते हैं और रूस के साथ पाइपलाइन सौदे करते हैं तथा रूस के खजाने में अरबों डॉलर भुगतान करते हैं। मैं समझता हूं कि यह बहुत ही अनुचित है।’ वह रूसी गैस आयात करने के लिए 11 अरब अमेरिकी डॉलर के बाल्टिक सागर पाइपलाइन का जिक्र कर रहे थे। हालांकि नाटो के महासचिव स्टोल्टेनबर्ग ने दावा किया कि 2017 में नाटो सदस्यों द्वारा रक्षा व्यय में सबसे ज्यादा वृद्धि देखी गई है, वे रक्षा पर अपनी जीडीपी का चार फीसदी खर्च नहीं कर सकते हैं, जिसकी मांग ट्रंप ने की है।

ब्रुसेल्स में नाटो शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर डोनाल्ड टस्क, और यूरोपीय संघ के अध्यक्ष ने याद दिलाया, ‘यूरोपीय संघ की तुलना में अमेरिका के पास बेहतर सहयोगी नहीं है और न होगा। हम रूस और चीन से कहीं ज्यादा रक्षा पर खर्च करते हैं…प्रिय अमेरिका, अपने सहयोगियों की प्रशंसा करें, आपके पास बहुत सहयोगी नहीं हैं।’ इसके जवाब में ट्रंप ने एक ठेठ ट्वीट किया-नाटो देशों को ज्यादा भुगतान करना होगा और अमेरिका को कम भुगतान करना होगा। ओबामा के जोरदार प्रयासों, सावधानीपूर्वक बातचीत और राजनयिक कौशल ने शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी को मनाया और सीओपी 21 पेरिस समझौता अक्तूबर 2015 में हुआ। अधिकांश यूरोपीय संघ के देशों समेत 195 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। लेकिन अरबपति व्यापारी से राष्ट्रपति बने ट्रंप ने कहा, यह अमेरिका के लिए अनुचित था और समझौते से बाहर निकल गया!

अमेरिकी दूतावास को येरूशलम स्थानांतरित करने के ट्रंप के फैसले की यूरोपीय सहयोगियों ने अनदेखी कर दी। ईरान और रूस से सौदा करने वाले तीसरे देशों के खिलाफ प्रतिबंध के माध्यम से अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला करने का ट्रंप का फैसला भारत समेत कई देशों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। यह ट्रंप प्रशासन के लिए विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। कई लोग ट्रंप पर मित्रों और दुश्मनों के बीच अंतर करने में विफल होने, मानवाधिकारों और मानवीय चिंताओं की अनदेखी करने और संकीर्ण आर्थिक और सुरक्षा हितों पर विदेशी नीति पर ध्यान केंद्रित करने में विफल होने का आरोप लगाते हैं। क्या यह अमेरिका-यूरोपीय आर्थिक संबंधों के लिए आत्मघाती नहीं होगा? यूरोपीय कंपनियां अमेरिका में कुल एफडीआई का 63 फीसदी निवेश करती हैं, जबकि अमेरिकी कंपनियां यूरोपीय देशों में कुल एफडीआई का 50 फीसदी निवेश करती हैं। ये निवेश मिलकर अमेरिका और यूरोप में चालीस लाख रोजगार पैदा करते हैं। स्वघोषित स्थायी जिनियस ट्रंप क्या पश्चिमी गठबंधन की यह बड़ी तस्वीर नहीं देख पाते?

(सुरेंद्र कुमार कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके है। ये उनके निजी विचार हैं।)

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